शनिवार, 7 दिसंबर 2013

शिव के पांच आवरणों में स्थित सभी देवताओं की स्तुति तथा उनसे अभीष्टपूर्ति एवं मंगलकी कामना




















आप अद्भुत है, आपकी जय हो. आप महान है आपकी जय हो. आप अक्षत(निर्विकार) है, आपकी जय हो. आप अविनाशी है. आप की जय हो. अप्रमेय परमात्मन! आपकी जय हो. मायारहित महेश्वर! आपकी जय हो. अजन्मा शिव! आपकी जय हो. निर्मल शंकर , आपकी जय हो. संजय मेहता



महाबाहो! महासार ! महागुण ! महती कीर्तिकथा से युक्त ! महाबली महामायावी! महान रसिक तथा महारथ !… आपकी जय हो आपकी जय हो. जय माता दी जी


आप परम आराध्या को नमस्कार है. आप परम कारण को नमस्कार है. शांत शिव को नमस्कार है और आप परम कल्याणमय प्रभु को नमस्कार है

देवताओ और असुरोसाहित यह सम्पूर्ण जगत आपके अधीन है अत: आपकी आज्ञा का उल्लंगन करने में कौन समर्थ हो सकता है



हे सनातन देव! यह सेवक एकमात्र आपके ही आश्रित है; अत: आप इस पर अनुगृह करके इसे इसकी प्रार्थित वास्तु प्रदान करे



अम्बिके! जगन्मात:! आपकी जय हो सर्वजगन्मयी! आपकी जय हो. असीम ऐश्वर्यशालिनी! आपकी जय हो. आपके श्रीविग्रेह की कही उपमा नहीं है. आपकी जय हो। जय माता दी जी



मन, वाणीसे अतीत शिवे! आपकी जय हो! अज्ञानान्धकार का भंजन करनेवाली देवि ! आपकी जय हो . जन्म और जरासे रहित उमे! आपकी जय हो. काल से भी अतिशय उत्कृष्ट शक्तिवाली दुर्गे ! आपकी जय हो
जय माता दी जी



अनेक प्रकार के विधानोंमें स्थित परमेश्वरी! आपकी जय हो , विश्वनाथ प्रिये! आपकी जय हो। समस्त देवताओ कि आराधनीय देवि ! आपकी जय हो। सम्पूर्ण विश्व का विस्तार करनेवाली जगदम्बिके आपकी जय हो जय हो। जय माता दी जी



मंगलमय दिव्या अंगोंवाली देवि ! आपकी जय हो! मंगलो को प्रकाशित करनेवाली! आपकी जय हो। मंगलमय चरित्रवाली सर्वमंगले! आपकी जय हो। मंगलदियिनी माँ। आपकी जय हो माँ आपकी जय हो


परम कल्याणमय गुणोंकी आप मूर्ति है, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत आपसे ही उत्पन हुआ है, अत: आपमें ही लीन होगा जय माता दी जी



देवेश्वरी! अत: आपके बिना ईश्वर भी फल देने में समर्थ नहीं हो सकते। यह जन जन्मकाल से ही आपकी शरण में आया हुआ है। अत: देवि आप अपने इस भक्त का मनोरथ सिद्ध कीजिये। जय माता दी जी


प्रभो! आपके पांच मुख और दस भुजाएँ है। आपकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल है। वर्ण, ब्र्हम और कला आपके विगृह्रूप है। आप सकल और निष्कल देवता है। शिवमूर्ति में सदा व्याप्त रहनेवाले है। शान्त्यतीत पदमें विराजमान सदाशिव आप ही है। मैंने भक्तिभाव से आपकी अर्चना की है। आप मुझे प्रार्थित कल्याण प्रदान करे। . जय माता दी जी


सदाशिवके अङ्कमे आरूढ़ , इच्छा शक्तिसवरूपा , सर्वलोकजननी शिवा मुझे मनोवांछित वास्तु प्रदान करे --- जय माता दी जी



शिव और पार्वती के प्रिय पुत्र , शिव के समान प्रभावशाली सर्वज्ञ तथा शिव - ज्ञानामृत का पान करके तृप्त रहनेवाले देवता गणेश और कार्तिकेय परसपर स्नेह रखते है। शिवा और शिव दोनों से सत्कृत है तथा ब्र्ह्मा आदि देवता भी इन दोनों देवो का सर्वथा सत्कार करते है। यह दोनों भाई निरतंर सम्पूर्ण लोको कि रक्षा करने के लिए उद्य्त रहते है और अपने विभिन्न अंशोद्वारा अनेक बार स्वेच्छापूर्वक अवतार धारण करते है। वे ही ये दोनों बंधू शिव और शिवा के पार्श्वभाग में मेरे इस प्रकार पूजित हो उन दोनों की आज्ञा ले प्रतिदिन मुझे प्रार्थित वास्तु प्रदान करे। .... जय माता दी जी



जो शुद्ध स्फटिकमणि के समान निर्मल, ईशान नाम से प्रसिद्ध और सदा कल्याण सवरूप है, परमात्मा शिव कि मूर्धाभिमानिनी मूर्ति है , शिवार्चनमें रत, शांत , शान्तयातीत कलामे प्रतिष्ठित , आकाशमण्डल में स्थित शिव - पंचाक्षर का अंतिम बीज - सवरूप , पांच कलाओंसे युक्त और प्रथम आवरण में सबसे पहले शक्ति के साथ पूजित है, वह पवित्र परबर्हम मुझे मेरी अभीष्ट वास्तु प्रदान करे - जय माता दी जी


जो प्रात: काल के सूर्य की भाँती अरुण प्रभा से युक्त , पुरातन, तत्पुरष नाम से विख्यात , परमेष्ठी शिव के पूर्ववर्ती मुख का अभिमानी, शांतिकलासवरूप या शांति कला में प्रतिष्टित , वायुमण्डल में स्थित शिव- चरनर्चन-परायण, शिव के बीजों में प्रथम और कलाओंमें चार कलाओंसे युक्त है, मैंने पूर्वदिशा में भक्तिभाव से शक्तिसहित जिसका पूजन किया है, वह पवित्र परब्र्हम शिव मेरी प्रार्थना सफल करे -- जय माता दी जी



जो अंजन आदिके समान श्याम, घोर शरीरवाला एवं अघोर नाम से प्रसिद्ध है, महादेव जी के दक्षिण मुख का अभिमानी तथा देवाधिदेव शिव के चरणोका पूजक है , विद्यक्ला पर आरूढ़ और अग्निमंडल के मध्य विराजमान है, शिवबीजो में द्वितीय तथा कलाओ में अष्टकलायुक्त एवं भगवान् शिव के दक्षिणभाग में शक्ति के साथ पूजित है, वह पवित्र परबर्ह्म मुझे मेरी अभीष्ट वास्तु प्रदान करे --- जय माता दी जी



जो कुमकुमचूर्ण अथवा केसरयुक्त चंदन के समान रक्त-पीत वर्णवाला , सुंदर वेषधारी और वामदेव नाम से प्रसिद्ध है, भगवान् शिव के उत्तरवर्ती मुख का अभिमानी है, प्रतिष्ठकलामें प्रतिष्ठित है, जल के मण्डल में विराजमान तथा महादेवजी की अर्चना में ततपर है , शिवबीजोमें चतुर्थ तथा तेरह कलाओसे युक्त है और महादेवजी के उत्तरभाग में शक्ति के साथ पूजित हुआ है, वह पवित्र परबर्ह्म मेरी प्रार्थना पूर्ण करे। जय माता दी जी


जो शंख , कुंद और चंद्रमा के समान धवल , सौम्य तथा स्ध्योजात नाम से विख्यात है, भगवान् शिव के पश्चिम मुख का अभिमानी एवं शिवचरणो kii अर्चना में रत है , निवृत्तिकलामे प्रतिष्ठित तथा पृथ्वी मण्डल में स्थित है, शिवबीजो में तृतीया , आठ कलाओं से युक्त और महादेव जी के पश्चिम भाग में शक्ति के साथ पूजित हुआ है, वह पवित्र परबर्ह्म मुझे मेरी प्रार्थित वस्तु दे। जय माता दी जी


शिव और शिवाकी ह्रदयरूपी मूर्तियाँ शिवभाव से भावित हो उन्ही दोनों के आज्ञा शिरोधार्य करके मेरा मनोरथ पूर्ण करे। जय माता दी जी


जो वृषभों के राजा महातेजस्वी, महान , मेघके समान शब्द करनेवाले, मेरु, मंदराचल, कैलास और हिमालय के शिखर की भांति ऊँचे एवं उज्ज्वल वर्णवाले है, श्वेत बादलो के शिखर की भांति ऊँचे ककुद से शोभित है, महानागरज (शेष) के शरीर की भांति जिनकी शोभा बढ़ाती है, जिनके मुख , सींग और पैर भी लाल है, नेत्र भी प्राय: लाल ही है, जिनके सारे अंग मोटे और उन्नत है, जो अपनी मनोहर चाल से बड़ी शोभा पाते है, जिनमे उत्तम लक्षण विद्यमान है, जो चमचमाते हुए मणिमय आभूषण से विभूषित हो अत्यंत दीप्तिमान दिखायी देते है, जो भगवान् शिव को प्रिय है, और शिव में ही अनुरक्त रहते है, शिव और शिवा दोनों के ही जो ध्वज और वाहन है तथा उनके चरणो के सपर्श से जिनका पृष्ठभाग परम पवित्र हो गया है, जो गौओ के राजपुरष है, वे श्रेष्ठ और चमकीला त्रिशूल धारण करनेवाले नंदिकेश्वर वृषभ शिव और शिवा की आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे अभीष्ट वस्तु प्रदान करे। । जय माता दी जी



जो गिरिराजनान्दिनी पार्वती के लिए पुत्र के तुल्य प्रिय है, श्री विष्णु आदि देवताओंद्वारा नित्य पूजित एवं वन्दित है , भगवान् शंकर के अंत:पुर के द्वार पर परिजनो के साथ खड़े रहते है, सर्वेश्वर शिव के समान तेजस्वी है तथा समस्त असुरों को कुचल देने की शक्ति रखते है, शिवधर्म का पालन करनेवाले सम्पूर्ण शिवभक्तो के अध्यक्षपदपर जिनका अभिषेक हुआ है, जो भगवान् शिव के प्रिय , शिव में ही अनुरक्त तथा तेजस्वी त्रिशूल नामक श्रेष्ठ आयुध धारण करनेवाले है। भगवन शिव के शरणागत भक्तोपर जिनका स्नेह है तथा शिवभक्तो का भी जिनमे अनुराग है, वे महातेजस्वी नंदीश्वर शिव और पार्वती की आज्ञा को शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करे -- जय माता दी जी


दूसरे महादेव के समान महातेजस्वी महाबाहु महाकाल महादेव के शरणागत भक्तो की नित्य ही रक्षा करे जय माता दी जी

वे भगवान् शिव के प्रिय है , भगवान् शिव में उनकी आसक्ति हा तथा वे सदा ही शिव तथा पार्वती के पूजक है, इसलिए शिवा और शिव कि आज्ञा का आदर करके मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करे -- जय माता दी जी


जो सम्पूर्ण शास्त्रो के तात्विक अर्थ के ज्ञाता , भगवान् विष्णु के द्वितीय सवरूप , सबके शासक तथा महामहात्मा कद्रू के पुत्र है, मधु, फल का गुदा और आसव जिन्हे प्रिय है, वे नागराज भगवान् शेष शिव और पार्वती की आज्ञा को सामने रखते हुए मेरी इच्छा को पूर्ण करे -- जय माता दी जी


ब्र्ह्माणी , माहेष्वरी , कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री तथा प्रचण्ड पराक्रम शालिनी चामुण्डा देवी -- ये सर्वलोकजननी सात माताएं परमेश्वर शिव के आदेश से मुझे मेरी प्रार्थित वस्तु प्रदान करे -- जय माता दी जी


जिनका मतवाले हाथी सा मुख है , जो गंगा , उमा और शिव के पुत्र है , आकाश जिनका शरीर है, दिशाएँ भुजाएँ है, तथा चंद्रमा , सूर्य और अग्नि जिनके तीन नेत्र है, ऐरावत आदि दिव्या दिग्गज जिनकी नित्य पूजा करते है, जिनके मस्तक से शिवज्ञानमय मद की धारा बहती रहती है, जो देवताओं के विघ्न का निवारण करते है और असुर आदि के कार्यो में विघ्न डालते रहते है, वे विघ्नराज गणेश शिव से भावित हो शिवा और शिव की आज्ञा शिरोधार्य करके मेरा मनोरथ प्रदान करे -- जय माता दी जी


जिनके छः मुख है, भगवान् शिव से जिनकी उत्पत्ति हुई है, जो शक्ति और वज्र धारण करनेवाले प्रभु है, जो अग्नि के पुत्र तथा अर्पणा (शिवा) के बालक है, गंगा, गणामबा तथा कृत्तिकाओं के भी पुत्र है, विशाख, शाख और नैगमेय - इन तीनो भाइयो से जो सदा घिरे रहते है, जो इंद्र-विजयी, इंद्र के सेनापति तथा तारकासुर को परास्त करनेवाले है, जिन्होंने अपनी शक्ति से मेरु आदि पर्वतो को छेद डाला है जिनकी अंगकान्ति तपाये हुए सुवर्ण के समान है, नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान सुंदर है, कुमार नाम से जिनकी प्रसिद्धि है, जो सुकुमार के रूप के सबसे बड़े उदाहरण है, शिव के प्रिय , शिव में अनुरक्त तथा शिव - चरणो की नित्य अर्चना करनेवाले है , स्कन्द, शिव और शिवा कि आज्ञा शिरोधार्य करके मुखे मनोवांछित वस्तु दे - जय माता दी जी

सर्वश्रेष्ठ और वरदायिनी ज्येष्ठा देवी , जो सदा भगवान् शिव और पार्वती के पूजन में लगी रहती है, उन दोनों की आज्ञा मानकार मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करे -- जय माता दी जी


त्रैलोक्यवन्दिता , साक्षात उल्का (लुकाठी) जैसी आकृतिवाली गणाम्बिका , जो जगत की सृष्टि बढ़ाने के लिए ब्र्ह्मा जी के प्रार्थना करने पर शिव के शरीर से पृथक हुई शिवा के दोनों भोंहों के बीच से निकली थी, जो दाक्षायणी , सती, मेना तथा हिमवानकुमारी उमा आदि के रूप में प्रसिद्ध है , कौशिकी , भद्रकाली, अर्पणा और पाटलाकी जननी है , नित्य शिवार्चन में तत्पर रहती है एवं रुद्रवल्ल्भा रुद्राणी कहलाती है , वे शिव और शिवा की आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु दे -- जय माता दी जी



हिम , कुन्द और चंद्रमा के समान उज्ज्वल, भद्रकाली के प्रिय, सदा ही मातृगणों की रक्षा करनेवाले, दुरात्मा दक्ष और उसके यज्ञ का सिर काटनेवाले, उपेन्द्र , इंद्र और यम आदि देवताओ के अंगोमे घाव कर देने वाले, शिव के अनुचर तथा शिव कि आज्ञा के पालक, महातेजस्वी श्री मान वीरभद्र शिव और शिवा के आदेश से ही मुझे मेरी मनचाही वस्तु दे - जय माता दी जी


महेश्वर के मुखकमल से प्रकट हुई तथा शिव - पार्वती के पूजन में आसक्त रहने वाले वे सरस्वती देवी मुझे मनोचांछित वस्तु प्रदान करे। । जी माता दी जी


तेरी ममता के सब भूखे, क्या सच्चे क्या झूठे माँ
बुरे-भले ये सभी तुम्हारे बगिया के है बूटे माँ
जय माता दी जी










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