सोमवार, 23 अप्रैल 2012

सीता जी का धरती में समाना : Sita ji ka dharti mai smaana . By Sanjay Mehta Ludhiana








सीता जी का धरती में समाना







वाल्मीकि रामायण में वर्णन आता है कि रामजी अंतिम यज्ञ नैमिषार्णय में किया. अयोध्या के पास यह नैमिषार्णय है. नैमिषार्णय यात्रा जिन वैष्णवों ने कि होगी उनको विदित होगा कि वह एक जानकी कुण्ड है. वह के साधू ऐसा बतलाते है कि श्री सीता माता इसी धरती में समायी है. और इनके स्मारक-स्वरूप इस कुण्ड का नाम जानकी कुण्ड है. माता जी यही लीन हुई है

श्री रामचंद्र जी के यज्ञ का निमन्त्रण वाल्मीकि जी को भी गया

वाल्मीकि ऋषि कि बहुत इच्छा थी कि किसी भी प्रकार से रामजी मान जाये और सीता जी को घर में रखे. श्री सीतारामजी सुवर्ण-सिंहासनपर एक साथ विराजे और मै दर्शन करू. मै रामजी को समझाऊंगा , रामजी को उलाहना दूंगा, बहुत दिन हो गए. अब मुझे यह रहस्य सभा में प्रकट करना है.

एक दिन दरबार भरा हुआ था. उस दरबार में वाल्मीकिजी ने भाषण दिया

बहु वर्ष सहस्त्राणि तपश्चर्या मया कृता
मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्व न किल्बिषम्

साठ हजार वर्ष तक मैंने तपश्चर्या कि है. मन, वाणी अथवा कर्म से मैंने कोई पाप नहीं किया. एक दिन भी मैंने झूंठ नहीं बोला. मै प्रतिज्ञापूर्वक कहता हु कि सीता जी महान पतिव्रता है. सीता जी अति पवित्र, शुद्ध एवं निर्दोष है

आज ऋषि ने सभा में प्रकट किया कि श्री सीताजी मेरे आश्रम में है. रामराज्य में प्रजा बहुत सुखी है. जितना महान सुख रामराज्य में तुमको मिलता है, उतना स्वर्ग के देवताओं को भी नही मिलता परन्तु लोगो को धिक्कार है कि ऐसे श्री रामजी के सुख का तनिक भी विचार नहीं करते. जिन रामजी के राज्य में इतना महान सुख तुमको मिला है, उन रामजी कि क्या स्थिति है? अकेले श्रीराम जी राजमहल में रहते है, अकेली सीताजी मेरे आश्रम में है. यह तुम लोगो से कैसी सहन किया जा रहा है? तुम्हारी सेवा जैसी श्री रामचन्द्र जी ने कि है वैसी किसी राजा ने अपनी प्रजा कि सेवा नहीं कि. तुम्हारी आराधना के लिए ही रामजी ने निर्दोष सीताजी का भी त्याग किया

आज मै प्रतिज्ञापूर्वक कहता हु कि सीताजी महान पतिव्रता न हो तो मेरी साठ हजार वर्ष कि तपस्या व्यर्थ हो जाए श्री सीताजी महान पतिव्रता ना हो तो मै नर्क में पडू, मेरी दुर्गति हो

श्री सीताजी का स्मरण हुआ और ऋषि वाल्मीकि का ह्रदय द्रवीभूत हो गया. उन ऋषि ने श्रीसीताजी का बहुत बखान किया और अयोध्या कि प्रजा को बहुत उलाहना दिया. वे आवेश में आकर बोलने लगे.

आयोध के लोग कैसे है मुझे खबर नहीं पड़ती. लोगो को लज्जा भी नहीं आती. ये लोग मनुष्य ये या राक्षस? को विचार ही नहीं करता. तुमलोग रामजी को क्यों नहीं कहते कि माताजी को जल्दी घर में पधराओ, नहीं तो हम अन्न-जल छोड़कर प्राण त्याग करते है

आज तो बोलते-बोलते ऋषि ने रामजी को भी उलाहना दिया, रामजी को भी बहुत सुनाई, इन्होने रामजी से कहा, तुम्हारा अन्य सभी कुछ ठीक है परन्तु तुमने श्री सीताजी का त्याग किया यह बहुत बुरा किया है ..

मुझको यह सहन नहीं होता. मेरी बहुत भावना है कि श्रीसीताजी के साथ आप सुवर्णसिंहासन पर आप विराजो और मै दर्शन करू. मुझे दक्षिणा में और कुछ भी नहीं माँगना, केवल इतना ही माँगना है. वे मेरी कन्या महान पतिव्रता है ऋषि बहुत आवेश में बोलने लगे. उस समय रामजी सिंहासन से उठकर दौड़ते हुए आये और वाल्मीकि जी के चरण पकडे और ऋषि के चरणों में माथा नवाया. कहा मै जानता हु के वे महान पतिव्रता है, निर्दोष है, परन्तु गुरूजी! मै क्या करू, मेरा दोष नहीं. अयोध्या के लोग चाहे जैसा बोलते है. कितनो ही के मन में शंका है, लंका में उन्हों ने अग्नि में प्रवेश किया था, परन्तु अयोध्या की प्रजा को विश्वास नहीं आता

मेरे चरित्र के विषय में लोगो को शंका होती है. प्रजा को शुद्ध चरित्र का आदर्श बताने के लिए मेरी इच्छा न होते हुए भी मैंने त्याग किया है. सीताजी की पवित्रता का मुझे तो विश्वास है परन्तु अयोध्या के लोगो को विश्वास होना चाहिए, मेरी बहुत इच्छा है के एक बार सीता जी दरबार में पधारे और अयोध्या की प्रजा को विश्वास हो सके, ऐसा कोई उपाए बतावे. उसके पश्चात् मै सीताजी को घर में लाऊ

वाल्मीकि जी आश्रम में आते है और सीताजी को समझाते है बेटी! आज रामजी के साथ बहुत बाते हुई और प्रभु ने ऐसा कहा है कि मेरी बहुत इच्छा है कि एक बार वे दरबार में आवे. बेटी! तुम जाओगी तो मै तुम्हारे साथ रहूँगा.

ऋषि सीताजी को समझाते है. सीताजी बहुत व्याकुल हुई. उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर कहा. पतिदेव कि आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है. प्रभु ने मेरा त्याग किया, यह योग्य था और आज मुझे दरबार में बुलाते है. यह भी योग्य है. ये जो कुछ भी करते है. वह सब हो योग्य है. उनकी इच्छा है तो मै दरबार में आउंगी. वाल्मीकि जी रामचंद्र जी के पास आये और उन्हों ने कहा कि महाराज श्रीसीताजी दरबार में पधारेंगी. इसके लिए दिन निश्चित हो गया.

नियत दिन पर भारी दरबार भरा हुआ है. देवता और ऋषि दरबार आये हुए है. अयोध्या कि प्रजा दौड़ रही है. सभी को सीताजी का प्रभाव देखने कि इच्छा है

वाल्मीकि जी सीताजी को दरबार में लेकर आते है. श्रीसीता माँ , वाल्मीकि जी के पीछे पीछे चल रही है. नजर धरती पर है. श्री सीताजी माँ किसी पर दृष्टि डालती नहीं. माँ ने दोनों हाथ जोड़ रखे है. वे जगत को वन्दन कर रही है .. :'(

माँ ने काषाय वस्त्र पहन रखे है सौभाग्य - अलकार के आलावा दूसरा कोई श्रृंगार नहीं है. श्रीराम के वियोग में सीता जी ने अनाज का सेवन किया नहीं है. इससे माँ का श्रीअंग अतिशय दुर्बल दीख पड़ते है. लव - कुश पीछे पीछे चल रहे है

अयोध्या के प्रजा सीताजी का दर्शन करती है. श्री सीता माँ का दर्शन करते करते सब रोने लग गए. श्री सीता माँ का जय - जयकार करने लगे.

सिंहासन पर श्रीरामचन्द्रजी विराजे हुए है. श्रीसीताजी उनका वन्दन करती है. उसके पश्चात् सीता माँ का सुंदर भाषण हुआ. धरती पर नजर रख कर माँ बोली

श्री रामचन्द्र जी के बिना किसी पुरष का मैंने स्मरण भी किया ना हो , प्रभु के द्वारा त्याग किये जाने पर भी मेरे मन में उनके प्रति कुभाव ना आया हो, पतिव्रता-धर्म का मैंने बराबर पालन किया हो, आचरण , वाणी और विचार से सदा-सर्वदा श्रीरामजी का है चिन्तन किया हो., यह सब जो मैंने कहा , वह सत्य हो तो हे धरती माँ!, मुझे अपनी गोद में स्थान दो , अब तो मुझे मार्ग दो, मुझे अब इस जगत में रहना नहीं है ..



सीता माँ के मुख से ज्यो ही ये शब्द निकले, वही पर एकाएक धडाका हुआ, धरती फट गई, शेषनाग के फन के ऊपर सुवर्ण का सिंहासन बहार आया, श्री भूदेवी ने श्रीसीता माँ को उठा कर सिंहासन पर बैठाया और कहा. पुत्री यह जगत अब तुम्हारे रहने योग्य नहीं. लोगो को सम्मान देना आता ही नहीं. सिंहासन पर ज्यो ही श्री सीताजी विराजी, लव-कुश घबरा कर दौड़ते आये. हमारी माँ कहा जाती है? सात-आठ वर्ष के बालक है. माँ ने बलैया ली और कहा - 'बेटा! राजा राम तुम्हारे पिता है. तुम अब अपने पिता कि सेवा करना, तुम्हारी माँ जाती है'

सब देखते ही रह गए. एक क्षण में सिंहासन के साथ श्री सीताजी आद्र्श्य हो गयी, धरती में लीन हो गई. पीछे तो अयोध्या के लोग बहुत विलाप करते है. श्रीराम आनन्द रूप है परन्तु सीताजी के वियोग में उन्हों ने भी विलाप किया है

श्री सीताजी का चरित्र अति दिव्या है, उनकी प्रत्येक लीला दिव्या है, श्री सीताजी का जनम दिव्या , श्री सीताजी का जीवन दिव्या और श्री सीता जी कि शेष लीला भी दिव्या है, श्री सीताजी के समान महान पतिव्रता स्त्री इस जगत में कोई नहीं है. भविष्य में होगी भी नहीं

बोलिए जय माता दी
फिर से बोलिए जय माता दी













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