मंगलवार, 29 मई 2012

महर्षि वेदव्यास और उनके युवा पुत्र शुकदेव: Maharishi vedvyas or unke yuva putr shukdev By Sanjay Mehta Ludhiana









विषय-विकार का कारण वस्तुत: स्त्री-पुरष का भेद ही है, प्रभु ने उस भेद को समाप्त कर अभेद अवस्था को प्राप्त कर लिए, अत: वे अवेद - निर्विकार बन गये. भागवत में एक बहुत मार्मिक प्रसंग आता है


एक बार महर्षि वेदव्यास और उनके युवा पुत्र शुकदेव मार्ग से गुजर रहे थे, जंगल का रस्ता था, वेदव्यास आगे-आगे चल रहे , शुकदेव कुछ कदम पीछे- पीछे आ रहे थे, मार्ग में एक सरोवर आया, उसका पानी बहुत स्वच्छ था, कुछ गंधर्व-कन्याए वहा स्नान के लिए आई हुई थी , निर्जन वन, एकांत स्थल , किसी प्रकार का आवागमन नहीं था. इसलिए वह नि:संकोच भाव से सरोवर में जल-क्रीडा का आनंद लेने लगी, कुछ कन्याए स्नान कर रही थे, कुछ तैर रही थी, कुछ वस्त्र धो रही थी, कुछ तट पर खड़ी बाल सुखा रही थी, अचानक वेदव्यास आते दिखाई दिए, तो सारी की सारी संकोचवश तिरोहित होने की चेष्टा करने लगी, कोई पानी में नीचे बैठ गई, कोई तट पर खड़े वृक्षों की ओट में हो गई, कइयो ने वस्त्र अपने उपर डाल लिए, वेदव्यास बिना उनकी तरफ ध्यान दिए सहज भाव से आगे बढ़ गये. थोड़ी ही दूर पीछे से शुकदेव आ रहे थे. वे भी सरोवर के पास से गुजरने लगे. उन्हें देखकर गंधर्व-कन्यायो ने कोई पर्दा नहीं किया. वे नि:संकोच-भाव से जल-क्रीडा में लगी रही, उनमे किसी प्रकार की हलचल नहीं हुई. मानो कोई वहां से गुजरा ही ना हो. अनायास वेदव्यास ने पीछे मुड़कर देखा, उस समय शुकदेव बिलकुल सरोवर के पास से ही गुजर रहे थे, गंधर्व - कन्यायो का यह व्यवहार देखर वेदव्यास चकित रह गये, यह क्या? मै इतना वृद्ध, अठारह पुराणों का करता, तत्वमर्मज्ञ , मुझ से इन कन्याओं ने पर्दा किया, संकोच अनुभव किया और तरुण शुकदेव से कोई लज्जा नहीं, कोई संकोच नहीं, आश्चर्य है, स्त्री को समझ पाना अत्यंत दुष्कर है

वे अपने मन की उथल-पुथल को रोक नहीं पाए, वापस उस सरोवर पर आये, गंधर्व-कन्याओ ने पहले की तरह संकोच किया, वेद व्यास ने कहा. तुम मेरी पुत्रियो के सद्रश हो तथा मै तुम्हारे पिता = पितामह के समान हु, मै तुमसे एक प्रश्न पूछने आया हु. मै इस मार्ग से गुजरा, तुमने संकोच किया, वह स्वाभाविक था. परन्तु शुकदेव के आने पर तुम नि:शंक भाव से अपना कार्य करती रही, मानो जैसे कोई पुरष वहा हो ही नहीं, इसके पीछे क्या रहस्य है? मै यह देखर संशय में पड़ गया. तुमसे इसका कारण जानना चाहता हु.

गंधर्व-कन्याए बोली - महर्षे , आपका प्रश्न यथार्थ है, यह भी सत्य है की आप परम ज्ञानी , उत्क्रष्ट साधक तथा असाधारण तत्वज्ञ है, फिर भी आपकी आँखों में स्त्री-पुरष का भेद तो विद्यमान है ही, यदि भेद नहीं होता तो यह प्रश्न पूछने आप वापस क्यों आते? ऋषिवर! शुकदेव एक शिशु की ज्यो सर्वथा और निर्विकार और निर्वेद है , उसके मन में स्त्री-पुरष का अंतर ही नहीं है, वह केवल आत्मा को ही देखता है, उसकी आँखों में ना कोई स्त्री है, ना कोई पुरष है ना कोई नपुंसक है, जहाँ भेद है, वहां पर्दा है, अभेद में पर्दा नहीं होता, शिशु से माँ कब पर्दा करती है ? क्युकि बालक की आँखों में केवल माँ ही माँ है, दूसरा भेद उसकी दृष्टि में है ही नहीं. वेदव्यास उनके उतर से बहुत संतुष्ट हुए, गंधर्व - कन्याओं का यह कथन उन्हें यथार्थ प्रतीत हुआ की शुकदेव बालक की तरह निर्लेप है, सम्पूर्णत: विकार्शुन्य है और स्वय उनकी दृष्टि में अब तक बेद विद्यमान है.








सोमवार, 28 मई 2012

प्रेरक प्रसंग: Prerak Prsng By Sanjay mehta Ludhiana








प्रेरक प्रसंग



जब भी धार्मिक कार्य का अवसर आता है, माया - मोह के वश हुआ अज्ञानी प्राणी उसे आगे के लिए टाल देता है, प्राचीन संत एक रूपक सुनाया करते थे.

एक सेठ अपने व्यापार - व्यवसाय में इतना व्यस्त रहता था कि कभी सत्संग में नहीं जाता, कभी भगवान का स्मरण नहीं करता, कभी स्वाध्याये नहीं करता. उसी गाँव में एक बड़े अच्छे कथावाचक रहा करते थे, वे रामायण, महाभारत आदि कि कथा करते रहते थे, वाणी में बड़ी सरसता थी. इसलिए सत्संगी लोगो कि अच्छी उपस्तिथि होती थी, पर वह मायालुब्ध सेठ कभी सुनाने नहीं आया, एक बार व्यास जी को वह सेठ रस्ते में मिल गया, व्यास जी ने कहा. सेठ! कभी तो सत्संत का लाभ लीया करो. कथा-श्रवण के लिए समय निकला करो व्यवहार का निर्वाह करते हुए सेठ ने कहा - क्यों नहीं व्यासजी महाराज, अवश्य सुनूंगा. पर आजकल तो बहुत सर्दी पड़ती है. इतनी कडाके कि सर्दी में प्राय: घर से बाहर नहीं निकलता हु. थोड़ी सर्दी कम हो जाये, फिर सत्संग में जरुर आऊंगा. यह कहकर सेठ आगे बढ गया.

पोष , माघ के महीने निकल गये , सर्दी बहुत कम हो गई, बसंत की हवाए चलने लगे. आते-जाते व्यासजी फिर सेठ की मिल गये. तुरंत व्यासजी ने सेठ की कही हुए बात का स्मरण करवाया और काया. अब तो सर्दी काफी कम हो गई है, अब तो कभी समय निकालो, सेठ ने कहा - आपका कहना तो ठीक है, पर आजकल दुकान पर "सीजन" का बहुत काम है, सुबह से शाम तक वही व्यस्त रहना पड़ता है . यदि कमाए नहीं तो खाये क्या? ग्रहस्थी की गाडी कैसे चले? इसलिए सीजन के समय तो वक्त निकलना मुश्किल है, हां थोडा सा कार्य भार कम हो जाए फिर कथा अवश्य सुनूंगा. दो-तीन महीने बाद सेठ फिर व्यासजी से टकरा गया, व्यासजी तो मानो दृढ-स्कल्पी थे, सेठ का पीछा नहीं छोड़ना है, देखो यह कहा तक बहाने निकलता है, व्यासजी ने सेठ को कथा सुनाने की प्रेरण फिर दी

सेठ ने सोचा, यह तो बड़ा संकट हो गया, यह व्यास तो मेरा पीछा नहीं छोड़ता, पर मे भी इससे उपर का हु, उसने कहा - व्यासजी! कितनी लुए चल रही, भयंकर गर्मी का प्रकोप है, ऐसे में तो बाहर निकलना ही मुश्किल है, इन दिनों में तो सुनना कदापि सम्भव नहीं , गर्मी का प्रकोप कम होने पर अवश्य , ऐसे करते हुए सावन - भादों के दिन आ गये. अब तो सेठ! गर्मी भी समाप्त हो गई है. सावन-भादों के महीने हमारी संस्क्रती में धर्माचरण की दृष्टि से विशेष महत्व के है, इसलिए अब तो समय निकालना ही चाहिए. सेठ ने सोचा यह तो बड़ा विचित आदमी है, पीछा छोड़ता ही नहीं, बात को नया मोड़ देते हुए सेठ ने कहा. आपका कथन बिलकुल सत्य है, पर चातुर्मास पूर्ण होते ही मेरी लड़की की शादी है, ग्रेह्स्थ के लिए लड़की को विदा करना कोई साधारण बात नहीं है. मैंने तो अभी से तैयारिया शुरू कर दी है. घर में दर्जी, सोनी आदि काम कर रहे है, घर में रंग-रोगन वगैरह भी करवाना है, अभी तो मुश्किल है

कुछ दिन बाद अचानक सेठ के हार्ट में दर्द उठा और वह चल बसा , चारो और बात फ़ैल गई, सगे-सम्बन्धी इकट्ठे हुए और सेठ को श्मशान ले जाने की तैयारी करने लगे.

अर्थी उठी, लोग "राम राम सत्य है " बोलते हुए श्मशान की और बढ़े. व्यास जी का घर रस्ते में आ गया "राम राम सत्य है" की आवाज सुनकर व्यासजी बाहर आये और पूछा - किसकी मृत्यु हो गई है? लोगो ने सेठ का नाम बतलाया , अच्छा! तो आखिर सेठ चल ही बसा. कहते हुए व्यासजी ने पोथी-पन्ने बगल में दबाये और अर्थी के साथ चल पड़े.

श्मशान से कुछ दुरी पर "बीच का वासा" अर्थी को नीचे उतरा. व्यासजी ने सबको एक और हटने का संकेत किया तथा स्वयम पोथी खोलकर अर्थी के सन्मुख बैठने लगे. लोगों ने कहा - व्यासजी महाराज! यह क्या कर रहे हो? व्यासजी ने कहा - इतने दिन सेठ को समय नहीं था. सर्दी, गर्मी, व्यापार, कन्या का विवाह आदि कार्य इसके धर्माचरण में व्यावधान बने हुए थे. आज सारी बधाये समाप्त है, सारी जिम्मेदारिय पूरी हो गई है, इसलिए इसको कथा सुनाने का आज ही अवसर है. आप सब सज्जन थोड़ी देर प्रतीक्षा करे, मै इसको कुछ महत्वपूर्ण पाठ सूना देता हु, लोगों ने कहा -व्यासजी! आप सुनाना तो चाहते है, पर आपकी बात सुनेगा कौन, क्या सेठजी आपकी बात सुनेंगे? तीखा व्यंग्य कसते हुए व्यासजी ने कहा - सेठ तो नहीं सुनता पर तुम तो सुनते हो ?

कहने का तात्पर्य यह है कि मृत्यु के आते ही सारी जिम्मेदारियां समाप्त हो जाती है


Sanjay Mehta







शनिवार, 26 मई 2012

शंकर महादेव क्यों हो गये: Shanker Mahadev Kyu Ho Gaye By Sanjay mehta Ludhiana







अमर वह बन जाता एकदम
चरण में झुक जाता आलम


शंकर महादेव क्यों हो गये? एक बड़ा प्रेरक रूपक है - देवो और असुरो ने मिलकर समुन्द्र का मंथन किया. मेरु को मथानी और शेषनाग को नेतरा - मथानी की डोरी बनाया .. समुन्द्र - मंथन का ध्येय था अमृत प्राप्त करना, पर पहले विष का कुम्भ उपर आ गया, अब उसे ले कौन? देव - दानव सब इनकार हो गया. कोई उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं. कहते है, उस विषपूर्ण कुम्भ को लेकर सब पौह्चे बाबा भोलेनाथ के पास. और भोलेनाथ तो ठहरे भोलेनाथ . देवो-दानवो ने कहा - महाराज हमने समुन्द्र-मंथन किया है. उसमे यह विष निकला है, अब इस कालकूट को कौन ग्रहन करे? शंकरे ने कहा - लाओ मुझे दे दो. मंथन करने वाले बड़े प्रसन हुए - और वह विष का कुम्भ शम्भु को दे दिया. महादेव उस विष को पी गये और उसे अमृत में परिणत कर लिए , कहते है उन्हों ने उस हलाहल का पान किया और गले मे ही उसे पर्यवसित कर लीया. ना तो उसे आमाशय में जाने दिया और ना वापस वमन ही किया. योग - शक्ति से उसे कंठ में ही हजम कर लीया, परिणामस्वरूप उनका कंठ नीला पड़ गया. इसलिए शंकर का एक नाम नीलकंठ भी है .
यह रूपक एक गहरा संकेत देता है, क्रोध के दो परिणाम आते है. या तो क्रोध के वेग में मनुष्य गालिया बंकने लगता है , उस क्रोध का वमन कर देता है, या फिर उस समय कुछ ना बोलकर उस विष-ग्रंथि को उदरस्थ कर लेता है. मन में बड़ा वग है , भीतर ही भीतर गुनगुना लेता है आने दो समय, इसका प्रतिशोध लेकर छोडूंगा. इन दोनों स्थितियो में विष हजम नहीं होता. विष को जीर्ण तो शम्भु ने इस भांति किया - ना उसे उदर में जाने दिया और ना उसे वापस बाहर ही फेंका. इस अनुपम तितिक्षा , सहिष्णुता के कारण शम्भु महादेव बन गये, ब्रह्मा , विष्णु आदि सब देव कहलाते है, जबकि शंकर महादेव कहलाते है








मंगलवार, 22 मई 2012

जय माता दी कहिये, साढ़े लगदे नहीं रुपैये: Jai Mata Di Kahiye By Sanjay mehta Ludhiana










जय माता दी कहिये, साढ़े लगदे नहीं रुपैये



मैया जी ने सानु हथ वी दिते

मैया जी ने सानु हथ वी दिते

तालिय बजांदे रहिये , साढ़े लगदे नहीं रुपैये

जय माता दी कहिये, साढ़े लगदे नहीं रुपैये




मैया जी ने सानु मुह वी दिता

मैया जी ने सानु मुह वी दिता

भेंटा गांदे रहिये , साढ़े लगदे नहीं रुपैये

जय माता दी कहिये, साढ़े लगदे नहीं रुपैये




मैया जी ने सानु कन वी दिते

मैया जी ने सानु कन वी दिते

भेंटा सुन्दे रहिये साढ़े लगदे नहीं रुपैये

जय माता दी कहिये, साढ़े लगदे नहीं रुपैये



मैया जी ने सानु पैर वी दिते

मैया जी ने सानु पैर वी दिते

यात्रा करदे रहिये साढ़े लगदे नहीं रुपैये

जय माता दी कहिये, साढ़े लगदे नहीं रुपैये



Sanjay Mehta








सोमवार, 21 मई 2012

सनत्कुमार: Sanatkumar By Sanjay Mehta Ludhiana










वैकुण्ठ के सात दरवाजे है, सनत्कुमार जी भगवान् विष्णु जी से मिलने के लिए छह दरवाजे पार कर गये सातवे दरवाजे पर जय-विजय ने उन्हें रोक लिए , सनत्कुमारो की आँखे लाल हो गई, क्रोध में उन्होंने जय-विजय को शाप दे दिया तुम इस भूमि के लायक नहीं, जाओ तुम राक्षस होऊ , दैत्यकुल में तीन बार जन्म लेना पड़ेगा.

परमात्मा विचार करते है के सनत्कुमारो ने मेरे द्वार पर क्रोध किया है, इससे ये अंदर आने योग्य नहीं, आज तक इनको क्रोध के उपर विजय मिली नहीं, इससे मेरे धाम में आने के लिए योग्य नहीं, मै ही बाहर जाकर दर्शन देता हु

परमात्मा बाहर आये, परमात्मा के श्रीअंग में से कमल की दिव्या सुगंध आती है, परमात्मा के दर्शन करने से सनत्कुमारो को अपनी भूल समझ आती है, उन्हों ने प्रभु से क्षमा मांगी

भगवान ने जय-विजय से कहा, तुम्हारा अपमान तो मेरा अपमान है तुम्हारे पृथ्वी पर तीन अवतार होन्गे परन्तु तुम्हारा उद्दार करने के लिए मै चार अवतार लूँगा

पहले जन्म में जय-विजय हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिप हुए दुसरे जन्म में रावण-कुम्भकर्ण हुए तीसरे जनम में शिशुपाल-दंत्वक्त्र हुए, हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिप लोभ के अवतार है, रावण-कुम्भकर्ण काम के अवतार है, शिशुपाल-दंत्पक्त्र क्रोध के अवतार है, काम-क्रोध और लोभ-मनुष्य के ये तीन महाशत्रु है, ये नरक के द्वार है

प्रभु ने वराह और नरसिंह अवतार लेकर हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिप को मारा, रामावतार धारण करके रावण और कुम्भकर्ण को मारा, कृष्णा अवतार में शिशुपाल और दंत्वक्त्र को मारा. तीन जन्म के पीछे जय-विजय पुन; प्रभु के धाम में आ गये.







शुक्रवार, 18 मई 2012

Shree Krishan , Bhisham Ji By Sanjay Mehta Ludhiana









भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध में प्रतिज्ञा की थी के वो अस्त्र नहीं उठायेंगे. पर भीषम जी ने कहा था केशव आप को मेरे लिए उठाने होन्गे. अब भगवान अपने भगत की बात को कैसे गलत होने देते. उन्हें युद्ध में रथ का पहिया उठाया, अपने भगत के लिए और भीषम जी यह जानते थे के भगवान ने उन का मान रखा और कहा

"कमललोचन आइए, आइए देवेश्वर जगन्निवास! आपको नमस्कार है, हाथ में चक्र लिए आये हुए माधव! सबको शरण देनेवाले लोकनाथ! आज युद्धभूमि में बलपूर्वक इस उत्तम रथ से मुझे मार गिराइए
श्री कृष्ण! आज आपके हाथ से यदि मै मारा जाऊंगा, तो इहलोक और परलोक में भी मेरा कल्याण होगा, अन्धक और वृष्णि कुल की रक्षा करने वाले वीर आपके इस आक्रमण से तीनो लोको में मेरा गौरव बढ़ गया , आप इच्छानुसार मेरे उपर प्रहार कीजिये, मै तो आपका दास हु' इसी समय अर्जुन जी ने पीछे से जाकर भगवान को अपनी भुजाओं में भर लिए, किन्तु इस पर भी वे अर्जुन को घसीटते हुए बड़ी तेजी से आगे ही बढ़े चले गये, तब अर्जुन ने जैसे - तैसे उन्हें दसवे कदम्पर रोककर दोनों चरण पकड़ लिए और बड़े प्रेम से दीनतापूर्वक कहा "महाबाहो! लौटिये; आप जो पहले कह चुके है की मै युद्ध नहीं करूँगा' उसे मिथ्या ना कीजिये, यदि आप ऐसा करेंगे तो लोग आपको मिथ्यावादी कहेंगे. यह सारा भार मेरे ही उपर रहने दीजिये, मै पितामाह का वध करूँगा, यह बात मै शस्त्र की सत्य की और पुण्य की शपथ करके कहता हु.








गुरुवार, 17 मई 2012

Shree Ram By Sanjay Mehta Ludhiana











किसी रामायण में ऐसा प्रसंग आता है, कि विवाह के पछ्चात रामजी , सीता जी के साथ अयोध्या पधारे, श्री सीता जी को श्री रामजी के चरणों कि सेवा करते - करते मन में थोडा अभिमान जाग गया, रामजी कि अपेक्षाक्रत मै सुंदर हु, मै कोमल हु. अभिमान जिव का पतन करनेवाला होता है, भक्ति करो किन्तु अभिमान छोडो. 'अहम' यदि बढ़ जाता है तो समझना कि भक्ति में भूल हुई है, सभी प्रकार के दोषों को परमात्मा क्षमा कर देते है, परंतु अभिमान परमात्मा से सहन नहीं होता, इसका भार उन्हें अत्यधिक लगता है
सीताजी , रामजी के चरणों कि सेवा करती थी, सीताजी चरण दबा रही थी, परन्तु परमात्मा को आज सीताजी के हाथ का भार सहन नहीं हो रहा था. चरण अत्यंत ही कोमल बन गए, मक्खन के उपर हाथ तिको तो उसपर गड्ढा पड़ जाता है. आज परमात्मा का श्रीअंग मक्खन से भी अधिक कोमल बन गया उन्हों ने सीताजी से कहा - 'तुम्हारे हाथ का वजन मुझ से सहन नहीं हो रहा है, उन्ही (अति कोमल) श्री राम जी को कैकई जी ने आज्ञा दी तब नंगे चरण वन में भी फिरे

हनुमान जी अत्यंत शक्ति है, एक समय हनुमानजी को भी इच्छा हुई कि रामजी को परिचय दू कि मुझमे कितनी शक्ति है. इसलिए जोर जोर से राम जी के चरण दबाने लगे. जिससे कि रामजी को कहना पड़े के बहुत जोर मत लगाओ. रामजी के नेत्र मूंदे हुए थे. हनुमान जी 'सीताराम सीताराम' का कीर्तन करते हुए चरण दबा रहे थे. जोर जोर से मुट्ठी भी लगा रहे थे, हनुमान जी कि ही मुष्टि से किसी समय रावण रुधिर-वमन तक कर चूका है , हनुमान जी का नाम 'बजरंग' मूल शब्द 'वज्रांग' - वज्र के समान कठोर अंग वाले

हनुमान जी आवेश में चरण -सेवा करते हुए मुष्टि -प्रहार कर रहे थे, परन्तु रामजी कि तो निंद्रा तक भंग ना हुई, श्री सीताजी सेवा करे उस समय रामजी कोमल बन जाते है, हनुमान जी सेवा करे तो उस समय वे कठोर बन जाते है, श्री राम जी कोमल है या कठिन? श्री राम दयालु है या निष्ठुर है , श्री राम जी के गुण तो अनंत है ...








बुधवार, 16 मई 2012

अम्बे माँ....... जगदम्बे माँ..... Ambe Maa Jagdambe Maa By Sanjay Mehta Ludhiana








जय जय माँ, जय जय माँ, जय जय माँ
हे मैया मै हु तेरी दासी
तू करुणा की निर्मल गंगा
मै जन्मो की प्यासी
हे मैया मै हु तेरी दासी
अम्बे माँ....... जगदम्बे माँ.....

मन मंदिर में मैया मैंने तेरी ज्योत जला ली
तुझ चरणन की पावल धूलि, माथे मैंने लगा ली
हे मैया मै हु तेरी दासी
अम्बे माँ....... जगदम्बे माँ.....

एक तुम्हारा नाम है सांचा और है बंधन झूठे
जीवन-पथ पर कभी माँ तुम्हारा, प्यार ना मुझसे रूठे
हे मैया मै हु तेरी दासी
अम्बे माँ....... जगदम्बे माँ.....

लाल चुनरिया से माँ अम्बे मेरी काया ढक ले
इत-उत अब माँ क्यों मै भटकू-२
अपने पास ही रख ले
हे मैया मै हु तेरी दासी
अम्बे माँ....... जगदम्बे माँ.....

Sanjay Mehta








मंगलवार, 15 मई 2012

कथा सुनाऊ सबको मै पवन पुत्र बलवान की: Katha Sunau Sabko Mai Pavan Putar Hanuman Ki By Sanjay Mehta Ludhiana









कथा सुनाऊ सबको मै पवन पुत्र बलवान की
जय बोलो हनुमान की, जय बोलो हनुमान की

बालपन में बजरंगी ने अपना बाल दिखलाया
हुआ अँधेरा पृथ्वी पर तब इन्दर सामने आया
दे वरदान तब देवराज ने सूरज को छुड्वाया
सभी देवता करे बड़ाई बजरंगी बलवान की
जय बोलो हनुमान की, जय बोलो हनुमान की

मात सिया की सुधि लेने अशोक वाटिका आये
भूख लगी जब बाग़ उजाड़े तोड़ - तोड़ फल खाए
खबर लगी रावण को तो पकड़ लीया बुलवाए
पूंछ में जिस दम आग लगाई लंका दई जलाए
मात सिया को दी अंगूठी यह निशानी श्री राम की
जय बोलो हनुमान की, जय बोलो हनुमान की

पाताल पूरी में मकरध्वज ने आकर करी लड़ाई
अहिरावण को मरूँगा तू हट जा रे बलदाई
पेड़ के पीछे छिपकर के फिर खाए माल मिठाई
अहिरावण को मार के फिर देवी को बलि चढ़ाई
राम - लखन को संग में लाये खेल के बाजी जान की
जय बोलो हनुमान की, जय बोलो हनुमान की

और सुनो फिर गद्दी पर बैठे एक दिन श्री राम
मोती की माला पहनाई मात सिया ने आन
इक - इक मोती तोड़ - तोड़ के फेंक दिए हनुमान
बोलो जिसमे राम नहीं उससे मेरा क्या काम
चीर दिखाया सीना है बैठे रघुवर जानकी
जय बोलो हनुमान की, जय बोलो हनुमान की








सोमवार, 14 मई 2012

बोल मुख से अगर बोल बम बम बम : Bol Mukh se agar bol bm bm bm By Sanjay Mehta Ludhiana







तर्ज : हे मालिक तेरे बन्दे हम ...

हे बन्दे तुझे क्या है गम, बोल मुख से अगर बोल बम बम बम
पाप धुल जायेगा, भाग्य खुल जायेगा, दुनिया चूमेगी तेरे कदम
भोले बाबा का गर नाम ले, उनके चरणों को गर थाम ले
तू वही पायेगा, जो भी फरमाएगा, मांग दिल से ना रख कुछ वहम
हे बन्दे तुझे क्या है गम, बोल मुख से अगर बोल बम बम बम

जग में उनकी बड़ी शान है, देने वाले वही दान है
हे विधाता वही , जग के दाता वही, भरी दौलत जहाँ है अगम
हे बन्दे तुझे क्या है गम, बोल मुख से अगर बोल बम बम बम

कोई पाया नहीं पार है, पूजता जिनको संसार है ,
आओ धाम चले, भोले से मिले, बोलना प्रेम से बम बम बम
हे बन्दे तुझे क्या है गम, बोल मुख से अगर बोल बम बम बम



जिन के ह्रदय में 'गकार' वाले ये चार शब्द निवास करते है उसका कभी पुनर्जन्म नहीं होता
१. गीता
२. गंगा
३. गायत्री
४. गोबिंद







मंगलवार, 8 मई 2012

रांका जी की कथा : Raanka Ji Ki Katha By Sanjay Mehta Ludhiana









रांका जी की कथा


यह रंकाजी यद्यपि जाति के कुम्हार थे, तथापि भगवदचरणों के आप बड़े अनुरागी थे. दिनभर कठिन परिश्रम करके आप जो कुछ भी कमाते थे, वह सब साधू संतो के सेवा में खर्च कर देते थे. एक दिन आपने कच्चे बर्तनों का अवा तैयार किया किन्तु किसी कारणवश उस में उस दिन आग ना दे सकते. रात्रि को बिल्ली ने आकर एक कच्चे बर्तन में अपने बच्चे दिए और कही चली गई, रांकाजी ने प्रात: काल उठते ही अवा में आग लगा दी , जब आग की लपट पूर्णतया उठ रही थी, उस समय किसी ने आप से कहा कि आपके अवा के किसी बर्तन में बिल्ली अपने बच्चे जनकर चली गई है. अब तो यह बड़े घबराये, किन्तु उस समय कर ही क्या सकते थे. आप दुःख से बिलख बिलख कर रोने लगे और उस दीनबंधु भगवान को याद करने लगे. क्युकि ऐसे समय सिवाए भगवान के और कोई सहारा ना था. यद्यपि रांकाजी का कुल घरवार जल जाता और चाहे स्वय भी अग्नि में भस्म जो जाते तो भी भगवान से किसी प्रकार कि प्राथना नहीं करते, भक्तो कि इच्छा तो प्रभु बिना मांगे ही पूरी करते है, किन्तु उस समय बिल्ली के बच्चो को मृत्यु के मुख में देखकर एक दम दया उपज आई और भगवान का स्मरण करने लगे. निदान जब प्रभु ने रांका जी को अत्यंत बिकल देखा तो ऐसी माया फैलाई कि समस्त अवा तो पक गया, लेकिन जिस बर्तन में बिल्ली के बच्चे थे उसमे आग कि गर्मी तक भी नहीं पहची , अनन्तर जब रांकाजी ने अबा उतरा तो बच्चे आनंद पूर्वक बैठे हुए मिले, ऐसी माया भगवान कि देखकर रांकाजी परमानंदित हुए और भगवान के श्री चरणों में झुकर साष्टांग प्रणाम किया, उस दिन से कुम्हारों में बराबर यह रीति चली आती है कि जिस दिन अवा तैयार करते है उसी दिन आग भी दे देते है, दुसरे दिन नहीं छोड़ते


सुख और दुःख दोनों सगे भाई है, ये साथ ही रहते है, जीव को सुख की भूख नहीं, आनंद की भूख है . यह आनंद चाहता है, पर आनंद संसार में नहीं, आनंद , इश्वर का स्वरूप है, जहाँ जगत है, वही सुख - दुःख है, जहाँ जगत नहीं, वहा सुख है ना दुःख. वहा है केवल आनंद. परमानंद -रूप श्री राम सुख देते नहीं, श्री राम दुःख देते नहीं, श्री राम तो केवल आनंद देते है.

किसी भी भाषा में "आनंद" का विरोधी शब्द मिलता नहीं, "सुख" का विरोधी शब्द "दुःख" है, "लाभ" का विरोधी शब्द "हानि" है. "राग" का विरोधी शब्द "द्वेष" है, आनंद का विरोधी शब्द कुछ नहीं, परमत्मा आनंदरूप है









सोमवार, 7 मई 2012

मेरी दुःख की कहानी माँ रो - रो के सुनाऊंगा: Meri Dukh Ki Kahaani Maa Ro Ro Ke Sunaunga By Sanjay Mehta Ludhiana








तेरे द्वार मै आऊंगा, तेरे दर्शन पाऊंगा
मेरी दुःख की कहानी माँ , रो - रो के सुनाऊंगा.


माँ इस दुखियारे को , चरणों में जगह देना
दुखो की हवा ना लगे, दामन में छुपा लेना
तेरी इस रहमत को माँ हरगिज ना भूलूंगा.
तेरे द्वार मै आऊंगा, तेरे दर्शन पाऊंगा

जब जब भी जन्म लू मै, तुमसे हो यही नाता
रहे हाथ तेरा सिर पे, तुम्ही हो पिता-माता
तेरी गोद में जग जननी , जन्नत मै बसाऊंगा
तेरे द्वार मै आऊंगा, तेरे दर्शन पाऊंगा

दुनिया के झमेलों से, ऐसा मै हु घबराया
तुम तो ना भुला देना, दुनिया ने है ठुकराया
कब तक बिना दर्शन के, जीवन मै बिताऊंगा
तेरे द्वार मै आऊंगा, तेरे दर्शन पाऊंगा

माँ तेरे ही नगमो की , लहरों में रहू बहता
लिख लिख के तेरी महिमा, दुनिया से रहू कहता
शीतल तेरी ज्योति को, मन में मै बसाऊंगा.
तेरे द्वार मै आऊंगा, तेरे दर्शन पाऊंगा








रविवार, 6 मई 2012

Question








तुम मंदिर में श्री राम जी का दर्शन करते हो, उस समय शायद तुमको ऐसा लगता है के जैसे मेरे हाथ-पैर हो, वैसे ही हाथ-पैर ठाकुर जी के भी है, परन्तु अपने शरीर में और ठाकुर जी के स्वरूप में बहुत अंतर है, अपने शरीर का विचार करोगे तो ध्यान में आएगा की इस शरीर के अंदर रुधिर है, मॉस है, मज्जा है, हड्डी है, श्रीराम जी के श्रीअंग में ना तो रुधिर, ना मॉस, ना मज्जा और ना हाड है, है तो केवल आनंद. आनंद के अलावा दूसरा कुछ भी नहीं



आज का सवाल
श्री राम जी की कथा सुनने के लिए हनुमान जी यही पर पृथ्वी पर रह रहे है. वैकुण्ठ गये नहीं, हनुमान जी महाराज अजर-अमर है सप्त-चिरंजीवियो में हनुमान जी की गिनती है , तो बाकी के 6 चिरंजीवी कौन है


Sanjay Mehta








शुक्रवार, 4 मई 2012

नवदुर्गा माता की स्तुति: Navdurga Mata Ki Stuti By Sanjay Mehta Ludhiana









नवदुर्गा बारे में स्वयं भगवान्‌ श्रीकृष्ण माता की स्तुति में कहते हैं-

त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी।
त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका॥

कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्‌।
परब्रह्मास्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी॥

तेजःस्वरूपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा।
सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्पर॥

सर्वबीजस्वरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया।
सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमंगलमंगला॥।

तुम्हीं विश्वजननी मूल प्रकृति ईश्वरी हो, तुम्हीं सृष्टि की उत्पत्ति के समय आद्याशक्ति के रूप में विराजमान रहती हो और स्वेच्छा से त्रिगुणात्मिका बन जाती हो। यद्यपि वस्तुतः तुम स्वयं निर्गुण हो तथापि प्रयोजनवश सगुण हो जाती हो।

तुम परब्रह्मस्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो। परम तेजस्वरूप और भक्तों पर अनुग्रह करने हेतु शरीर धारण करती हो। तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सर्वाधार एवं परात्पर हो। तुम सर्वाबीजस्वरूप, सर्वपूज्या एवं आश्रयरहित हो। तुम सर्वज्ञ, सर्वप्रकार से मंगल करने वाली एवं सर्व मंगलों की भी मंगल हो।

नवरात्रि पर्व पर श्रद्धा और प्रेमपूर्वक महाशक्ति भगवती देवी की उपासना करने से यह निर्गुण स्वरूपा देवी पृथ्वी के सारे जीवों पर दया करके स्वयं ही सगुणभाव को प्राप्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूप से उत्पत्ति, पालन और संहार कार्य करती हैं।







प्रेरक प्रसंग : Prerk Prasang By Sanjay Mehta Ludhiana








परमात्मा का शुक्र है



दोपहर का वक्त था, शाहजहाँ बादशाह को प्यास लगी, इधर - उधर देखा, नौकर कोई पास नहीं था, उस समय पानी की सुराही भरी हुई पास ही रखी होती थी, उस दिन सुराही में पानी का एक घुट भी ना था, कुए पर पौह्चा , पानी निकलने लगा, ज्योही आगे को झुकर देखा भौनी माथे में लगी, खून निकल आया , खून देखकर कहता है . "शुक्र है! शुक्र है! मेरे जैसे बेवकूफ को जिसको पानी भी नहीं निकलना नहीं आता, मालिक ने बादशाह बना दिया, शुक्र नहीं तो और क्या है?" मतलब यह की दुःख में भी उसने मालिक का शुक्र मनाया




पपीहे का प्रण

कबीर साहिब एक दिन गंगा के किनारे घूम रहे थे. उन्होंने देखा एक पपीहा प्यास से बेहाल होकर नदी में गिर गया है. पपीहा स्वाति नक्षत्र में बरसने वाली वर्षा की बूंदों के आलावा और कोई पानी नहीं पीता. उसके चारो और कितना ही पानी मजूद क्यों ना हो. उसे कितने ही जोर की प्यास क्यों ना लगी हो, वह मरना मंजूर करेगा. परन्तु और किसी पानी से अपनी पास नहीं बुझाएगा.

कबीर साहिब नदी में गिरे हुए उस पक्षी की और देखते रहे, सख्त गर्मी पड़ रही थी और वह प्यास से तड़प रहा था, पर उसने नदी के पानी की एक बूंद भी नहीं पी. उसे देखकर कबीर साहिब ने कहा.

जब मै इस छोटे से पपीहे की वर्षा के निर्मल जल के प्रति भक्ति और निष्ठां देखता हु कि प्यास से मर रहा है, लेकिन जान बचाने के लिए नदी का पानी नहीं पीता, तो मुझे मेरे इश्वर के प्रति अपनी भक्ति तुच्छ लगने लगती है

पपीहे का पन देख के, धीरज रही न रंच
मरते डम जल का पड़ा , तोउ न बोड़ी चंच

अगर हर भगत को परमात्मा के प्रति पपीहे जैसी तीव्र लगन और प्रेम हो, तो वह बहुत जल्दी उचे रूहानी मंडलो में पहुच जाये और अपने इश्वर को पा ले .

जय माता दी जी



Sanjay Mehta







गुरुवार, 3 मई 2012

आ गए तेरे द्वारे : Aa Gaye tere Dware By Sanjay Mehta Ludhiana







आ गए तेरे द्वारे



आ गए, आ गए
आ गए तेरे द्वारे
माई मेरी आ गए

तेरे लाडले बचडे प्यारे
माई मेरी आ गए
मुओ लाण तेरे जयकारे
माई मेरी आ गए
आ गए तेरे द्वारे
माई मेरी आ गए


उन्नू चरना दे विच लाइ
ऐना दे दिल दी प्यास बुझाई
माई मेरी आ गए


आये दर ते जो वी सवाली
मैया न मोड़े तू खाली
तेरे दर दी शान निराली
तेरे पैर विच खुशहाली
माई मेरी आ गए

तेरा दरबार माँ सबसे न्यारा
सबसे सोहना सबसे प्यारा
जिथ्थो मिलदा सबनू सहारा
माई मेरी आ गए


मेरी माँ सबदे कष्ट मिटाए
बेडी सबदी ओ बन्ने लाये
सच्चे मन नाल जो वी ध्याये
तैथो मन - चाहया फल पाए
श्रधा नाल जो जोत जगाये
मैया तैनू सन्मुख पाए
माई मेरी आ गए

माई सुए चोल्या वाली
वनडे बच्च्या नु खुशहाली
बख्शे हर चेहरे नु लाली
माई मेरी आ गए

तू सबदी आस पूजाए
तू सबदे भाग जगाये
तू सुत्ते भाग जगाये
माई मेरी आ गए

हे जगदम्बे , हे महामाया
तेरा अंत किसे ना पाया
तेरी कोई न समझे माया
तू ब्रह्मांड रचाया
माई मेरी आ गए

तू है कुल दुनिया दी रानी
दाती कोई ना तेरा सानी
माई मेरी आ गए

दूरो दूरो संगता आइय
चढ़के उच्चिया लमिया चढ़ाईया
सबदे दिला च खुशिया छाइय
माई मेरी आ गए

माई हो गई आप दयाल
लाये स्ब्नु चरना दे नाल
देवे हर संकट नु टाल
माई मेरी आ गए

भक्तो जय जैकार बुलाओ
भगतो जो चाहो सो पाओ
माई मेरी आ गए
आ गए - आ गए
आ गए तेरे द्वारे
तेरे लाडले बच्चे प्यारे
मुओ लान तेरे जयकारे
माई मेरी आ गए










मंगलवार, 1 मई 2012

मेरे भगवान् आये है : Mere Bhagwan Aaye Hai. By Sanjay Mehta Ludhiana









तर्ज : बहारो फुल बरसाओ मेरा



मेरे भगवान् आये है




लताओं पुष्प बरसाओ, मेरे भगवान् आये है
ऐ कोयल मीठे स्वर गाओ, मेरे भगवान आये है

लगी थी आस सदियों से, हुए है आज वो दर्शन
निभाने आज वादे को, पधारे खुद पतित-पावन आये है
मेरे कष्टों को हरने को, ये नंगे पाँव आये है
लताओं पुष्प बरसाओ, मेरे भगवान् आये है

करूं कैसे तेरी पूजा, न मन फुला समाता है
कहाँ जाऊ मै , समझ कुछ भी नहीं आता है
मुझे अपने रंग- रंगकर , बढाने मान आये है
लताओं पुष्प बरसाओ, मेरे भगवान् आये है


ना चाहिए दौलत मुझको, तेरी भक्ति मै चाहता हु
मेरे सिर हाथ हो तेरा, यही वरदान चाहता हु
अधम मुझ नीच पापी का , करने उद्धार आये है
लताओं पुष्प बरसाओ, मेरे भगवान् आये है








सोमवार, 30 अप्रैल 2012

जम्मू का टिकट कटा ले पिया: Jammu ka tikat kta le piya... By Sanjay Mehta Ludhiana











जम्मू का टिकट कटा ले पिया
जम्मू का टिकट कटा ले पिया
मैया के दर्शन को तरसे जिया

तुझे मैया के दर्शन कराऊंगा मै
प्यारा माँ का भवन दिखाऊंगा मै
जम्मू का टिकट करवाऊंगा मै
कटरा ले जायेगा तुझको पिया
यह तेरा पिया , दर्शन को मेरा भी धडके जिया

ओ मेरी मैया रानी, तेरी दुनिया दीवानी , दूर पर्वत पर बैठी
सारी जग की महारानी, तू ही दुर्गा भवानी तू ही माँ वैष्णो रानी
तेरे दर्शन की देखो, पूरी दुनिया है दीवानी

मैया ने मुझ को संदेसा है भिजाया
देख मुझे कटरा है बुलाया

मैया के उचे भवन जायेंगे
पावन के दर्शन मैया के पायेंगे
जीवन यह मैया को सोंप दिया
मैया के दर्शन को दरसे जिया
जम्मू का टिकट कटा ले पिया
जम्मू का टिकट कटा ले पिया
मैया के दर्शन को तरसे जिया

जय जय जय जय जय जय
जय माता की



कैसा है माँ के भवन का नजारा, कैसा होगा गुफा का द्वारा
स्वर्ग के जैसे नज़ारे वहा, बैठी है गुफा में मैया जहाँ
मैया ने मुझ को बुला ही लिया , दर्शन का फल है मुझ को दिया
जम्मू का टिकट कटा ले पिया
जम्मू का टिकट कटा ले पिया
मैया के दर्शन को तरसे जिया

तुझे मैया के दर्शन कराऊंगा मै
प्यारा माँ का भवन दिखाऊंगा मै
जम्मू का टिकट करवाऊंगा मै
कटरा ले जायेगा तुझको पिया
यह तेरा पिया , दर्शन को मेरा भी धडके जिया

ओ मेरी मैया रानी, तेरी दुनिया दीवानी , दूर पर्वत पर बैठी
सारी जग की महारानी, तू ही दुर्गा भवानी तू ही माँ वैष्णो रानी
तेरे दर्शन की देखो, पूरी दुनिया है दीवानी


















जगजननी श्री सीता जी : Shree Sita Maa : Sanjay Mehta Ludhiana









जगजननी श्री सीता जी





श्री सीता माता प्रेम की मूर्ति है. दया की समुंदर है. रामायण के अरण्यकांड में जयंत का प्रसंग आता है. जयंत ने अपराध श्री सीता माँ का ही किया परन्तु माताजी को उस पर दया आई, संत एसा मानते है की जयंत का अपराध अक्षम्य है, क्षमा करने लायक नहीं. रामजी जयंत को मारने के लिए तैयार हुए परन्तु सीताजी को दया आई, माताजी उसको क्षमा कर देती है. इतना ही नहीं रामजी से विनती करती है के इसे क्षमा करो

जग-जननी ने प्रभु स्म्मुखः कर क्रव्य अघ-ताप विनाश

वाल्मीकिजी ने युद्ध-कांड में श्री सीताजी की एक कथा वर्णन की है

रावण के साथ युद्ध पूरा हुआ, रामजी ने रावण का वध कर दिया. हनुमान जी को अशोक-वन में जाकर श्री सीताजी ले आने की आज्ञा हुए. हनुमान जी दौड़ते दौड़ते अशोक-वन आये. वहा शीशम वृक्ष के तले श्री सीता माँ श्री रामजी का ध्यान धरे बैठी है. फुल से श्री राम - नाम लिखा हुआ है. माताजी ने दृष्टि श्री राम-नाम में स्थित की हुई है. वे किसीपर दृष्टिपात करती नहीं. श्री हनुमानजी ने आकर श्री सीता माँ को साष्टांग वंदन किया और कहा 'माँ! तुम्हारे आशीर्वाद से अपनी जीत हुई है. प्रभु ने रावण का वध किया. श्री राम-लक्ष्मण आनंद में विराजे है. माँ! तुम्हारा यह दास आज आपको श्री राम जी के दर्शन करवाएगा. अब आप शीघ्र पधारे.

हनुमान जी रामचंद्र जी के दर्शन करायेंगे-यह सुनकर श्री सीता जी को अत्यंत आनद हुआ . आखे भावभीनी हो गई. श्री सीताजी ने प्रसन्न होकर हनुमान को को अनेक आशीर्वाद दिए. अनेक वरदान दिए -'हनुमान! सब सौम्य सद्गुणों का तुम्हारे अंदर निवास हो. आज मै तुमको क्या दू? मेरा आशीर्वाद है के मेरे हनुमान को काल भी नहीं मार सकेगा, मेरे हनुमान के आगे काल हाथ जोड़कर खड़ा रहेगा, काल सेवक बनकर रहेगा

काल प्रयेक की छाती के उपर पैर रखता है, काल एक - एक को मारता है, परन्तु हनुमान जी के आगे काल भी हाथ जोड़कर खड़ा रहता है, हनुमान जी महाराज आज भी इस लोक में विराजते है

श्री सीताजी कहते है 'मेरे हनुमान को काल मार सकता नहीं, हनुमान! मेरा आशीर्वाद है कि तू चिरंजीवी हो. साधू-महात्मा को ज्ञानी पुरष तुझे सदगुणी मानेंगे और तेरी पूजा करेंगे. जगत में तेरी कीर्ति खूब बढ़ेगी , तेरी बहुत पूजा होगी.

हनुमानजी संतो के सध्गुरू है. ज्ञानियो में आग्रनी है

हनुमान जी कि पूजा सर्वत्र होती है, अरे! रामजी कि पूजा अधिक होती है या हनुमानजी की? एक छोटा सा ग्राम हो, वहां कदाचित रामजी का मंदिर नहीं होगा परन्तु हनुमान जी कि एक छोटी - सी देहरी अवश्य होगी

श्री सीता माँ के प्रसन्नता का पार नहीं, माताजी कहती है - 'मेरा हनुमान जहाँ होगा वहा अष्टमहासिद्धिया इनकी सेवा में हाजिर रहेंगी.

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता , अस वर दिन्ह जानकी माता


हनुमान जी जिस समय श्री सीताराम कि सेवा में होते है, उस समय बालक जैसे होते है, जो बालक जैसा है, वही सेवा कर सकता है, सेवा में मान-विघ्न करता है, बड़े-बड़े महात्मा भी पांडित्य छोड़कर, बालक के समान बनकर, परमात्मा की सेवा करते है. सेवा के ज्ञान का अभिमान, प्रमाद उत्पन्न कराता है. हनुमान जी बालक के समान है, वे सीताजी से कहते है - ' माताजी ! आपने तो बहुत कुछ दिया है, वह ठीक है, परन्तु मै आज अपनी इच्छा से मांगता हु. आज तो मेरा मांगने का ख़ास हक़ है माँ!, मै मांगता हु, वह आज आपको देना ही पड़ेगा.

माताजी ने कहा - 'बेटा! मैंने तुझे देने में क्या बाकी रखा है? तू अमर हो जा. जगत में तेरी जय - जय कार हो

हनुमान जी ने कहा -'माँ! यह सब तो ठीक है, मुझको जो चाहिए , वही दीजिये

माताजी ने कहा - तब तुम मांगो बेटा! तुम जो मांगोगे वही मिलेगा.

हनुमान ने हाथ जोड़कर कहा. माँ! रामजी का सन्देश लेकर लंका में जब मै पहली बार आया था, तब मैंने अपनी आँखों से देखा था कि यह राक्षसिय मेरी माँ को बहुत त्रास देती थी, ये बहुत खराब बोलती थी, आपको बहुत डराती थी, बहुत खिझाती थी, माँ! यह सब मैंने अपनी आँखों से देखा है, रामजी ने राक्षसों को मारा है, परन्तु लंका में ये राक्षसिया अभी बाकी है, इन राक्षसियों को देखकर मुझे बहुत क्रोध आता है, इनको मारने कि मेरी बहुत इच्छा है. आप आज्ञा दे तो मै एक एक राक्षसी को पीस दू. मेरी माँ को जिन राक्षसियों ने त्रास दिया है, उनमे से एक एक को खूब दंड दू

हनुमान जी महाराज तो राक्षसियो को मारने कि लिए तैयार हो गए परन्तु सीता जी ने मना कर दिया, कहा - बेटा ! यह तू क्या मांगता है? मेरा पुत्र होकर तू ऐसी मांग करता है? वैर का बदला वैर से लेना योग्य नहीं . वैर का बदला प्रेम है,

सीता जी ने हनुमान जी से कहा - बेटा! बदला जो प्रेम से लेते है वे ही संत है, वैर की शांति वैर से नहीं प्रेम से होती है. अपकार का बदला उपकार से और अपमान का बदला मान से दे, वही संत है. ये राक्षसिया तो रावण की आज्ञा में थी, रावण के कहने से मुझे कष्ट देती थी. इसमें इनका तो कोई दोष नहीं. यह दुःख मेरे कर्मो का फल है, मैंने लक्ष्मण जी का अपमान किया, उसका यह फल मुझे मिला है, एक साधारण पशु भी स्वधर्म का पालन करता है, वह वैर के बदले प्रेम देता है.

इस लिए बेटा! तू इन राक्षसियो को मारना नहीं, मुझे इन राक्षसियो पर दया आती है, मै तो ऐसा विचार करती हु. कि अब मुझे अयोध्या जाना है, इतने अधिक दिन मै इन राक्षसियो के साथ रही हु. ये राक्षसिया जो कोई वरदान मांगे वह मुझको इन्हें देना है. बेटा! मैंने तो निश्चय किया है के मै इन राक्षसियो को सुखी करके ही यहाँ से जाऊ. यह राक्षसिया बहुत दुखी है. तू किसी भी राक्षसी को मारना नहीं

राक्षसियो को मारने की सीता जी ने मनाही की तो हनुमान जी ने सीता माँ का जय जयकार किया, सीता माँ को साष्टांग वन्दन करके हनुमान जी ने कहा - ऐसी दया तो मैंने श्री रामजी में भी देखि नहीं, श्री राम दयालु है, यह बात सत्य है, परन्तु ऐसी दया मैंने जगत में कही देखी नहीं, जगजननी! आपमें ही यह दया मैंने देखी , माँ! तुम जगन्माता हो, इसलिए तुमको सब पर दया आती है .

श्री सीता जी दया की , प्रेम की मूर्ति है, उनका वर्णन कौन कर सकता है, उनको तो सब पर दया आती है, वे जगत की माँ है

रामजी की माँ तो कौशल्या हो सकती है, परन्तु सीताजी की माँ कौन हो सकती है, श्री सीताजी की तो कोई माँ नहीं, इनका कोई पिता भी नहीं, यह सबकी माँ है, सर्वेश्वरी , सर्वश्रेष्ट है.

जगजननी की माँ कौन हो सकती है? उनकी माँ कोई हो सकती नहीं, श्री सीता जी का जनम दिव्या है, लय दिव्या है, श्री सीता माँ धरती से बाहर प्रकटी और धरती में ही लीन हो गई,

बोलिए सीता माता की जय
बोलिए मेरी माँ वैष्णो रानी की जय
बोलिए मेरी माँ राज रानी की जय
जय माता दी
जय श्री राम
जय श्री हनुमान














रविवार, 29 अप्रैल 2012

एक गोपी के घर लाला माखन खा रहे थे: Krishan Bhagwan Makhan Khaa Rahe The. By Sanjay Mehta Ludhiana









एक गोपी के घर लाला माखन खा रहे थे. उस समय गोपी ने लाला को पकड लिए. तब कन्हैया बोले - तेरे धनी की सौगंध खा कर कहता हु, अब फिर कभी भी तेरे घर में नहीं आऊंगा.

गोपी ने कहा - मेरे धनी की सौगंध क्यों खाता है ?

कन्हैया ने कहा. तेरे बाप की सौगंध , बस

गोपी और ज्यादा खीझ जाती है और लाला को धमकाती है परन्तु तू मेरे घर आया ही क्यों?

कन्हैया ने कहा - अरी सखी! तू रोज कथा में जाती है, फिर भी तू मेरा तेरा छोडती नहीं - इस घर का मै धनी हु, यह घर मेरा है

गोपी को आनंद हुआ कि मेरे घर को कन्हैया अपना घर मानता है, कन्हैया तो सबका मालिक है, सभी घर उसी के है. उसको किसी कि आज्ञा लेने कि जरूरत नहीं

गोपी कहती है - तुने माखन क्यों खाया ?

लाला ने कहा - माखन किसने खाया है ? इस माखन में चींटी चढ़ गई थी तो उसे निकलने को हाथ डाला. इतने में ही तू टपक पड़ी

गोपी कहती है. परन्तु लाला! तेरे ओंठो के उपर भी तो माखन चिपका हुआ है

कन्हैया ने कहा - चींटी निकालता था , तभी ओंठो के उपर भी तो मक्खी बैठ गई, उसको उड़ाने लगा तो माखन ओंठो पर लग गया होगा

कन्हैया जैसे बोलते है, ऐसा बोलना किसी को आता नहीं. कन्हैया जैसे चलते है, वैसे चलना भी किसी को आता नहीं. गोपी तो पीछे लाला को घर में खम्भे के साथ डोरी से बाँध दिया, कन्हैया का श्रीअंग बहुत ही कोमल है गोपी ने जब डोरी कस कर बाँधी तो लाला कि आँख में पानी आ गया. गोपी को दया आई , उसने लाला से पूछा - लाला! तुझे कोई तकलीफ है क्या

लाला ने गर्दन हिला कर कहा - मुझे बहुत दुःख हो रहा है, डोरी जरा ढीली करो

गोपी ने विचार किया कि लाला को डोरी से कस कर बाधना ठीक नहीं, मेरे लाला को दुःख होगा. इस लिए गोपी ने डोरी थोड़ी ढीली राखी और पीछे सखियो को खबर देने गई के मैंने लाला को बांधा है

तुम लाला को बांधो परन्तु किसी से कहना नहीं, तुम खूब भक्ति करो, परन्तु उसे प्रकाशित मत करो, भक्ति प्रकाशित हो जाएगी तो भगवान सटक जायेंगे, भक्ति का प्रकाश होने से भक्ति बढती नहीं , भक्ति में आनद आता नहीं.

बाल कृष्ण सूक्ष्म शरीर करके डोरी से बहार निकल गए और गोपी को अंगूठा दिखा कर कहा, तुझे बांधना ही कहा आता है?

गोपी कहती है - तो मुझे बता , किस तरह से बांधना चाहिए

गोपी को तो लाला के साथ खेल करना था, लाला गोपी को बांधते है

योगीजन मन से श्री कृष्ण का स्पर्श करते है तो समाधि लग जाती है. यहाँ तो गोपी को प्रत्यक्ष श्री कृष्ण का स्पर्श हुआ है. गोपी लाला के दर्शन में तल्लीन हो जाती है. गोपी को ब्रह्म - सम्बन्ध हो जाता है. लाला ने गोपी को बाँध दिया.

गोपी कहती है के लाला छोड़! छोड़! लाला कहते है - मुझे बांधना आता है. छोड़ना तो आता ही नहीं

यह जीव एक एसा है, जिसको छोड़ना आता है, चाहे जितना प्रगाढ़ सम्बन्ध हो परन्तु स्वार्थ सिद्ध होने पर उसको भी छोड़ सकता है, परमात्मा एक बार बाँधने के बाद छोड़ते नहीं

जय श्री कृष्ण
राधे राधे
जय माता दी जी
जय माँ वैष्णवी
जय माँ राजरानी







शनिवार, 28 अप्रैल 2012

माँ दुर्गा जग जननी : Maa Durga By Sanjay Mehta Ludhiana










माँ दुर्गा जग जननी है. करुना की मूर्ति माँ अपनी संतानों के दुःख से दुखी हो, उन्हें सताने वालो के लिए करालवदना महाकाली बन जाती है

शक्तिरूप है माँ, सभी देवो की शक्तियों का समदृष्टि रूप है, जगदम्बा!! इस लिए इनकी आराधना - उपासना का अर्थ है सभी देवो की पूजा करना, ये प्रसन्न हो , तो मानो सभी देव प्रसन्न हो गए. इनके बिना शिव शव है , भले ही शिव सर्व्शाक्तिस्म्पन्न हो, लेकिन इनके बिना वे निरीह है. किसी ने सच कहा है . माँ बन सकती है पिता, जबकि पिता कभी भी माता नहीं बन सकता

शंकराचार्य ने अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन किया . वहा ना पाप है ना ही पुण्य, लेकिन माँ के लिए उन्हों ने कहा ' हे माँ तुम्हारे समान कोई पापो को हरनेवाली नहीं है और मेरे समान कोई पातकी नहीं , उन्हें पूर्ण विश्वास है माँ की करुना पर तभी तो वे कहते है -- पूत कपूत हो सकता है, लेकिन माता कभी भी कुमाता नहीं होती

शक्ति के रूप में उपासना करनेवाले को उपासना के नियमो - उपनियमो का पालन करना होता है, जब कि जो माँ के रूप में इसकी अराधना करता है, उसके लिए सब क्षम्य है. माँ उसकी समस्त कामनाओं को सहज में पूरा कर देती है. सिर्फ 'माँ' इस महामंत्र का जप ही भक्ति-मुक्ति दाता है.

लोगो ने माँ के उग्र रूपों कि आरधना करने कि विधिया बताई है. लेकिन वे कठिन है. सही मार्गदर्शन न मिलने पर भटकने का खतरा ज्यादा है. उनमे..... सबसे श्रेष्ठ है जगजननी के माँ के रूप में अराधना
अब कहे जय माता दी
जय हो माँ वैष्णो देवी की
जय मेरी माँ राज रानी की