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रविवार, 22 दिसंबर 2013
महालक्ष्मी कोल्हापुर : Mahalakshmi Kolhapur: Sanjay Mehta Ludhiana
एक बार भृगुऋषि देवो कि परीक्षा करने गए। भगवान् नारायण शेष - शय्या में सोये हुए थे। लक्ष्मी जी सेवा कर रही थी। भृगुऋषि को क्रोध आ गया। सोचने लगे कि ये तो सारा दिन सोते ही रहते है ? उन्होंने नारायण की छाती पर लात लगायी। नारायण जागे . प्रभु ने भृगुऋषि से कहा - आपके कोमल चरणो को आघात लगा होगा। लाइए , आपकी सेवा करू। प्रभु ने भृगुलांछ्न - चिन्ह छाती में धारण कर लिया। लक्ष्मी जी ने कहा - इस ब्राह्मण को सजा दीजिये . पर प्रभु ने तो भृगुऋषि की सेवा करनी शुरू कर दी। लक्ष्मी जी नाराज हो गयी। लक्ष्मी जी ने प्रभु से कहा - विद्या बढ़ती है तो साथ में अभिमान भी बढ़ता है तो विध्या - तप का विनाश हो जाता है। इसलिए इन्हे सजा दीजिये , पर प्रभु ने इंकार किया। इससे लक्ष्मी जी बैकुंठ छोड़कर कोल्हापुर जाकर रही। वहाँ वे अकेली है , नारायण साथ में नहीं है। कोल्हापुर में उनका सवरूप उग्र है , आँखे बहुत बड़ी है , तब से उन्होंने निश्चय किया कि ब्राह्मण बहुत अभिमानी होते है। अब मुझे ब्राह्मणो के घर नहीं जाना। तब से ब्राह्मण के घर लक्ष्मी जी नहीं जाती है , पर भगवान् ब्राह्मण को मान देते है। नारायण तो छाती पर लात मारने वाले ब्राह्मण से भी प्रेम करते है। अब कहिये जय माता दी। जय श्री कृष्णा
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