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बुधवार, 11 दिसंबर 2013
"जो जाय गब्बर वह हॊ जब्बर। " : Jo Jaye Gabbar Vh Ho Jabbar :) Sanjay Mehta Ludhiana
"जो जाय गब्बर वह हॊ जब्बर। "
गब्बर पर जाने का मार्ग बहुत ही कठिन है, परन्तु श्रद्धाबल से बहुत छोटे-छोटे बच्चे भी उस पर चढ़ जाते है।
उपर्युक्त गब्बर शिखर के विषय में एक कथा प्रसिद्ध है , कहते है, पुरातन काल में एक ग्वाल की गायो में माता जी की गाये भी अज्ञातरूप से जंगल में चरने जाती थी। बहुत दिनों तक चराई नहीं मिलने के कारण एक दिन सायंकाल को वह ग्वाला उस गाय के पीछे-पीछे उसके मालिक के घर चला। वह गाये के साथ एक सुंदर मंदिर के पास आ पहुंचा। मंदिर में एक दिव्या रमणी सुंदर वस्त्र पहने झूले पर झूल रही थी। ग्वाले के चराई मांगने पर उसने कुछ जौ उसके कंबल में डाल दिए। ग्वाल असंतुष्ट होकर जौ बाहर फैंककर चलता बना। घर पहुँचने पर उसने सारा वृत्तांत अपनी स्त्री से कहा। स्त्री बुद्धिमती थी, ग्वाले कि बात सुनकर वह चकित हो गयी। उसने कंबल का वह कोना दिखलाने के लिए कहा जिसमें जौ डाला गया था। उसे देखते ही उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा , क्युकी कंबल में जौ के आठ दस दाने बच रहे थे वह सोने के थे। पीछे ग्वाले ने बहुतेरा ढूँढा पर ना तो उसे वह मंदिर ही मिला और ना वह दिव्या रमणी ही दीख पड़ी। बेचारा पछताकर रह गया।
'गब्बर' पर चढ़ने के रास्ते पर एक मील के बाद एक गुफा आती है। उसे 'माई का द्वार' कहते है। सुनते है कि इसी द्वार से भगवती के मंदिर में जाना होता था। पर्वत के भीतर देवी का एक मंदिर है उसमे देवी का झूला है , सुनते है भक्तो को कभी - कभी आज भी देवी के झूले कि ध्वनि सुन पड़ती है। द्वार तो सत्ययुग में ही बंद हो गया था , ऐसी जनश्रुति है
'गब्बर' के शिखर पर तीन स्थान है। एक माता जी के खेलने कि जगह। यहाँ पत्थर पर पैर की छोटी - छोटी अँगुलियों के चिन्ह दीख पड़ते है। दूसरा स्थान पारस-पीपला है और तीसरा श्रे कृष्ण भगवान् का ज्वारा है। इसी स्थान पर यशोदा जी ने श्री कृष्ण जी का मुंडन करवाया था।
जय माता दी जी
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