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गुरुवार, 26 मई 2011
दरबार तेरे आ गये..
लोग इस जहां को भूल जायेंगे..
लोग इस जहां को भूल जायेंगे..
माँ कभी ना हम तुम्हे भुलायेंगे..
जितनी भी जहां मे नेमते
माँ तुम्हारे द्वार की है रहमते..
जो कुछ भी माँ तुमने दे दिया..
क्यों करे ना हम तुम्हारे शुक्रिया..
हम तेरा माँ शुक्र ही मनाएंगे..
हम गिरे तो तुम ही सम्भालती
ममता से दुलार से हो पालती..
हम सभी माँ तेरे कर्जदार है..
हर घडी हर वक्त तलबगार है..
कैसे ये एहसान हम चुकायेंगे..
लोग इस जहान...
कब कहाँ तू कैसे आएगी नजर..
क्या पता तू क्या करेगी कब किधर
जिस जगह माँ जो तेरा आकर है..
उसको माँ प्रणाम बार बार है..
हम सिर को उस जगह झुकायेंगे..
लोग इस जहान..
Sanjay Mehta
बुधवार, 25 मई 2011
आरती क्या है और कैसे करनी चाहिए ...
आरती क्या है और कैसे करनी चाहिए ...
आरती को 'आरित्रिका' अथवा 'आरितिर्क' और 'निराजन' भी कहते है. पूजा के अंत मे आरती की जाती है.. पूजन मे जो त्रुटी रह जाती है .. आरती से उसकी पूर्ति होती है.. सकंद्पुरण मे कहा गया है.. :-
मन्त्रहीन क्रियाहीन यत पूजन हरे:
सर्वे स्म्पुर्न्तामेती क्रते नीराजने शिवे..
पूजन मन्त्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी निराजन (आरती) कर लेने से उसमे सारी पूर्णता आ जाती है..
आरती से पहले मूलमंत्र (भगवान् या जिस देवता का जिस मन्त्र से पूजन किया गया है , उस मन्त्र) के द्वारा तीन बार पुष्पांजली देनी चाहिए.. और ढोल , नगारे, शंख, घड़ियाल आदी म्हावाध्यो के तथा जय - जयकार के शब्द के साथ शुभ पात्र के घृत से या कपूर से विषय संख्या के अनेक बत्तिय जलाकर आरती करनी चाहिए..
साधारणत:पांच बत्तियो से आरती की जाती है.. इसे 'पंच्प्र्दीप' भी कहते है.. एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियो से आरती की जाती है.. कुमकुम , अगर, कपूर , चंदन, रुई, और घी, धुप की एक, पांच या सात बत्तिय बनाकर शंख, घंटा आदी बाजे बजाते हुए आरती करनी चाहिए...
आरती के पांच अंग होते है.. प्रथम दीपमाला के द्वारा, दुसरे जलयुक्त शंख से.. तीसरे धुले हुए वस्त्र से.. चोथे आम और पीपल आदि के पत्तो से और पांचवे साष्टांग दंडवत से आरती करे.. आरती उतारते समय सर्वप्रथम भगवान् कि प्रितमा के चरणों मे उसे चार घुमाये.. दो आर नाभिदेश मे.. एक बार मुखमंडल पर और सात बार समस्त अंगो पर घुमाये..
यथार्थ मे आरती पूजन के अंत मे इष्टदेव कि प्रसनता के हेतु की जाती है.. इसमें इष्टदेव को दीपक दिखने के सात ही उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है..
जय माता दी जी...
Sanjay Mehta
मंगलवार, 24 मई 2011
भगवान तुम्हारे चरणों मे.
भगवान तुम्हारे चरणों मे..
भगवान तुम्हारे चरणों मे.., मै तुम्हे रिझाने आया हु..
वाणी मे तनिक मिठास नहीं, पर विनय सुनाने आया हु..
प्रभु का चरणामृत लेने को, है पास मेरे कोई पात्र नहीं..
आँखों के दोनों प्याले मे.. कुछ भीख मांगने आया हु..
भगवान तुम्हारे चरणों मे..
तुम से लेकर क्या भेंट करू.. भगवान आपके चरणों मे..
मै भिक्षुक हु.. तुम दाता हु... सम्बन्ध बताने आया हु..
भगवान तुम्हारे चरणों मे..
सेवा को कोई वास्तु नहीं.. फिर भी मेरा साहस देखो..
रो रोकर आज आंसुओ का, मै हार चढाने आया हु...
भगवान तुम्हारे चरणों मे..
संजय मेहता
जय माता दी जी
सोमवार, 23 मई 2011
जाहि विधि रखे राम..
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शरण मे बुलाना पड़ेगा...
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शुक्रवार, 20 मई 2011
शाम तेरी बंसी हमे भी सुनादे
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मधुर राम का नाम जग मे .. मधुर राम का नाम..
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गुरुवार, 19 मई 2011
|| नाग लीला Naag Leela ||
|| नाग लीला Naag Leela || |
|| बजरंग बली मुझ पर ||
|| बजरंग बली मुझ पर ||
बजरंग बली मुझ पर थोड़ी से दया कर दो..
खाली है मेरी झोली इसको भी जरा भर दो..
तेरे द्वारे, पर आये है, बजरंगी मैहर करो..
दुखो से भरा जीवन सुख के भंडार भरो..
कांटो से भरा पथ है फूलो की डगर कर दो..
माँ अंजनि के जाए शंकर के अवतारी..
तेरी लीला को जाने कोई बिरला संसारी..
मै शरण पड़ा तेरी अब शीश हाथ धर दो..
मेरा तन मन बालाजी तुझ पर बलिहारी है..
मैंने तो अर्ज करी, अब मर्जी तुम्हारी है..
मेरी अर्जी पे अब तो थोड़ी से नजर कर दो..
ये दास संजय मेहता है.. तेरा सेवक मतवाला
मेहन्दीपुर के राजा बन जावो रखवाला..
एक बार दर्श देकर मेरा जन्म सफल कर दो..
Sanjay Mehta
भगवान श्री कृष्ण जी से विनम्र प्राथना...
भगवान श्री कृष्ण जी से विनम्र प्राथना...
जनार्दन ! यह संसार -समुंदर अत्यंत गहरा है... इसका पार पाना कठिन है.. यह
दुःखमयी लहरों और मोहमयी भांति भांति की तरंगो से भरा है.. मै अत्यंत दीन हु..
और अपने हो दोषों तथा गुणों से - पाप -पुण्यो से प्रेरित होकर इसमे फंसा हु..
अंतत: आप मेरा इससे उद्धार कीजिये...
कर्मरूपी बादलो की भारी घटा घिरी हुई है.. जो गरजती और बरसती भी है.. मेरे
पातको की राशि विधुल्ल्लता की भांति उसमे थिरक रही है.. मोहरूपी अन्धकार-समूह
से मेरी दृष्टि विवेकशक्ति नष्ट हो गई है.. मै अत्यंत दीन हो रहा हु..
मधुसुदन, मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिये..
यह संसार एक महान वन है, इसमें बहुत से दुःख ही वृक्ष रूप मे स्थित है..
मोहरूपी सिंह इसमें निर्भय होकर निवास करते है.. इसके भीतर शोकरुपी प्रचण्ड
दावानल प्रज्वलित हो रहे है.. जिसकी आंच से मेरा चित संतप्त हो उठा है.. कृष्ण!
इससे मुझे बचाइए
संसार एक वृक्ष के समान है.. यह अत्यंत पुराना होने के साथ बहुत ऊचा भी है..
माया इसकी जड है... शोक तथा नाना प्रकार के दुःख इसकी शाखाये है.. पत्नी आदी
परिवार के लोग पत्ते है... और इसमें अनेक प्रकार के फल लगे है.. मुरारे.. मै इस
संसार - वृक्ष पर चड़कर गिर रहा हु... भगवान ... इस समय मेरी रक्षा
कीजिये...
कृष्ण! मै दुखरुपी अग्नि, विविध प्रकार के मोह रुपी धुएं तथा वियोग, मृत्यु और
काल के समान शोक से जल रहा हु.. आप सर्वदा ज्ञान रुपी जल से सींचकर मुझे सदा के
लिए संसार बंधन से छुड़ा दीजिये..
कृष्ण! मै मोहरूपी अंधार राशि से भरे हुए संसार नामक महान गड्डे मे सदा से गिरा
हुआ हु... दीन हु.. और बी से अत्यंत व्याकुल हु.. आप मेरे लिए नोक बनाकर मुझे
उस गड्डे से निकालिए.. वहा से खींचकर अपनी शरण मे लीजिये..
जो सयम शील ह्रदय के भाव से युगत होकर अनन्य चित से आपका ध्यान करते है.. वे
आपकी पदवी को प्राप्त हो जाते है.. तथा जो देवता और किन्नर्ग्न आपके दोनों परम
पवित्र चरणों को प्रणाम करके उनका चिन्तन करते है.. वे भी आपकी पदवी को
प्राप्त होते है..
मै ना तो दुसरो का नाम लेता हु.. ना दुसरे को भजता हु.. और ना ही दुसरे का
चिन्तन करता हु... नित्य निरंतर आपके युगल चरणों को प्रणाम करता रहता हु.. इस
प्रकार मै आपकी शरण आया हु.. आप मेरी रक्षा करे.. मेरे पटक समूह शीघ्र दूर हो
जाए.. मै नोकर की भांति जन्म जन्म आपका दास बना रहू.. भवन आपके युगल चरण कमलो
को सदा प्रणाम करता हु...
श्री कृष्ण ... यदि आप मुझपर प्रसन्न है.. तो मुझे यह उतम वरदान दीजिये.. मेरी
माता श्रीमति राज रानी मेहता , पिता श्री सुदर्शन लाल मेहता को मेरी पत्नी
श्री मति सोनू मेहता .. मेरे बच्चे (पल्लवी,विकास,दीक्षा) मेरे परिवार को सभी
को आपकी भगति प्राप्त हो.. आप के लोक मे ले चलिए.. आपका आशीर्वाद सदा हमारे साथ
रहे.. भोले बाबा, गणपति जी महाराज.. माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती, माँ दुर्गा सब
का आशीर्वाद और सब के साक्षात दर्शन हो..
संजय मेहता...
जय माता दी जी..
Sanjay Mehta
बुधवार, 18 मई 2011
द्वार घाटे वाले का..
द्वार घाटे वाले का.. द्वार घाटे वाले का, दुखियो का ठिकाना है.. बाला जी के चरणों मे खुशिओ का खजाना है.. जग का सताया हु.. तेरे द्वारे पे आया हु.. क्या है परेशानी बाबा को बताना है... द्वार घाटे वाले का... सारी दुनिया मे ढूँढा तुझे मेहंदीपुर मे पाया है... तेरा मेरा ये रिश्ता बाबा सदियो पुराना है द्वार घाटे वाले का... संकट ने जिसको भी आकर के सताया है.. मेहंदीपुर आ जाओ गर संकट कटाना है.. द्वार घाटे वाले का... ये रिश्ता ये नाते, सब ढोंग दिखावा है.. मै हूँ तेरा तू है मेरा सारा जग ये बेगाना है.. द्वारे घाटे वाले का , दुखियो का ठिकाना है.. बाला जी के चरणों मै खुशिओ का खजाना है.. द्वार घाटे वाले का... Sanjay Mehta |
मंगलवार, 17 मई 2011
चरण वंदना..
चरण वंदना...
मात-पिता से बढकर जग मे, है कोई भगवान नहीं
मात-पिता की सेवा से बढकर, जग मे कुछ काम नहीं...
मात=पिता को जो दुःख देगा, वो पाता सम्मान नहीं..
मात-पिता का करे अनादर, पापी है इंसान नहीं..
कोन देवता पहले पूजा, जाए सूझी बात नई..
परिक्रमा ब्रह्मांड की जो , कर आये पहले पूजे वही
सभी देवता दोड पड़े पर, गणपति वाहन पर ना चडे ..
मात-पिता की परिक्रमा कर, सब से पहले हुए खड़े
हुए विजेता घोषित सब से, पहले पूजते सदा वही..
मात-पिता है पूजनीय, इससे बढकर कुछ ज्ञान नहीं..
जो छूता है पात पिता के, नित्य चरण सुख पता है
मिलती है आशीषे उसको, भवसागर तर जाता है..
मात-पिता का जो करता, उपहास चैन ना उसे मिले
सुख रुपी गुलाब के पोधे, उसके घर मे नहीं खिले.
मात-पिता सब से महान है, धर्म ग्रन्थ सब कहे यही..
स्वर्ग बसे उनके चरणों मे, और मिलेगा कही नहीं..
खुद गीले मे सोकर माँ ने, तुमको सूखे मे रक्खा
माँ का दूध कर्ज है तुम पर, कभी चूका ना पाओगे..
तुमको नरक भोगना होगा, माँ को अगर सताओगे..
मात-पिता को दुःख देने से, मिलते परमानंद नहीं..
उन्हें सुखी रक्खे बिना "संजय" पाओगे आनंद नहीं..
Sanjay Mehta

